गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

राजनीति का आईपीएल

अभी हाल ही में क्रिकेट में आईपीएल नाम का एक बड़ा संघ सामने आया है। सब कुछ अगर सोचे हुए रस्ते पर चला तो जल्द ही यह क्रिकेट का महाकुम्भ बन जायेगा। मुम्बई में इस संघ कि मंडी सजाई गई और क्या पोंटिंग क्या सचिन सबकी औकात की बोली लगी।

औकात के मामले में भारतीय कप्तान धोनी सबसे अव्वल रहे। पोंटिंग सहित कई खिलाडी अपनी औकाद की कम कीमत से नाराज भले ही होते रहे लेकिन मंडी में इन सबका कोई असर नहीं होने जा रहा है। भले ही इसके बाद कई खिलाडी अब अपनी टीम में भी इसी नए कीमत से आंके जायेंगे। सच कहें तो अब तक प्रचार से धन कमा कर ये खिलाडी टीवी पर लोगों को उनकी औकात बताते फ़िर रहे थे। लेकिन इस मंडी में उनकी ख़ुद की औकाद नप गई।

कल अचानक बातचीत में मेरे एक मित्र ने एक प्रस्ताव रख दिया। और कहा की क्यो ना देश की राजनितिक स्थिति में सुधर के लिए आईपीएल की तर्ज पर कोई लीग बनाया जाए। इससे जैसे आईपीएल क्रिकेट में छेत्रवाद को ख़त्म कर रहा है वैसे ही राजनीति में भी छेत्रवाद ख़त्म हो सकेगा। वहाँ बैठे सभी लोगो को ये आईडिया पसंद आया। लेकिन जब बात कीमत लगाने की आई तो फ़िर मामला फिल्मी स्टारस पर आकर ठहर गया। लोगों ने कहा की भाई कुछ भी कहो इस लीग में तो सबसे ज्यादा कीमत फ़िल्म से राजनीति में आई हस्तियों की ही लगेगी। या फ़िर ये भी हो सकता है किज्यादा कीमत लगती देख मलिक्का सहरावत जैसे ज्यादा डीमांड वाली लड़किया फिल्में छोड़कर राजनीति में ही शामिल होने लगें और मजबूर होकर राजनीति वाले उसी तरह का आन्दोलन करने लगें जैसे राज ठाकरे के समर्थक मुम्बई में उत्तर भारतीयों को आने से रोकने के लिए कर रहे हैं।

फ़िर आगे बात बढ़ी तो नेता लोगों की कीमत पर आई। अब सवाल उठा की नेता में से कौन किस टीम में लिया जायेगा। और टीम बनने केक्या होगा। किसी ने कहा की अगर राज ठाकरे को बिहार वाले खरीद ले जाए तब। मेरे एक मित्र महोदय तुरंत बोल उठे। भाई इसकी संभावना सबसे ज्यादा है। जैसे सैमोंड्स की कीमत धोनी के बाद सबसे ज्यादा लगी उसी तरह राज ठाकरे को तो बिहार वाले किसी भी कीमत पर अपने टीम के लिए खरीद कर ले जायेंगे। फ़िर सवाल उठा की मोदी जी के क्या होगा। सामने बैठे मेरे एक मित्र का कहना था की भाई वो तो अहमदाबाद टीम के अईकन प्लेयर रहेंगे। फ़िर हुआ की लालू जी का क्या होगा, जवाब था की भाई वो तो उसी टीम में जायेंगे जिस टीम में उनकी धाक बनी रहेगी चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना लगवानी पड़े।

बात ख़त्म ना होते देख मैन्स कहा भी ये कीमत तो लगती रहेगी। फिलहाल अभी इस लीग के आईडिया तो कोई सुझाए। फिलहाल तो आईपीएल के खेल ही देखिये और मजे लीजिये। इस लीग की एक ख़ास बात ये भी रहेगी की कोई भी टीम हारे किसी कि जान जाने लायक बात नहीं रहेगी। क्योंकि जितने वाली टीम में भी कोई ना कोई पसंदीदा खिलाडी तो रहेगा ही। उसी के बारे में सोचकर खुश हो लेंगे लोग। .....

संदीप सिंह

( संदीप सिंह दूरदर्शन से जुड़े हैं)

झारखंड गढ़ने की शर्त


झारखंड में राजनीति का एक नया ग्रामर है विकसित हुआ है। झारखंड बने सात साल से ज़्यादा गुज़र गए, इन गुजरे सात सालों में झारखंड के लोगों को क्या मिला? वहां की विधायिका और राजनीति की क्या सौगात है वहां के लोगों को? जवाब है, पूरी व्यवस्था को अविश्वसनीय बना देना।




झारखंड के शासक वर्ग ने दिका दिया कि वे पूरे स्टेट को भी बेच सकते हैं। हालांकि राजनीति के जिस ग्रामर की बात मैं कर रहा हूं, वह देश भर में यत्र-तत्र दिखाई देता था, लेकिन झारखंड में यह ग्रामर स्थापित हो गया है। भ्रष्टाचार के प्रैक्टिसनर। आचार-व्यवहार में जो प्रामाणिक तौर पर सबसे भ्रष्ट हैं वे ही भ्रष्टाचार की बुराई कर रहे हैं। यानी चोर और साधु की भूमिका एक हो गई है। नायक, खलनायक लग नहीं रहे। पर यह झारखंड का ग्रामर है। कहावत है- सेन्ह पर बिरहा। यानी सेंध की जगह से ऊंचे आवाज में गीत गाया जाए। भयमुक्त और सात वर्षों के झारखंड की देन है ये।i


{क्या झारखंड विकास की नई पगडंडी पकड़ सकता है? हां, लेकिन तब जब हम मानलें कि मौजूदा राजनीतिक पार्टियों में से कोई झारखंड का पुनर्निर्माण नहीं कर सकता। लोकपहल, छात्रशक्ति का उदय, झारखंड के सार्वजनिक जीवन की संपूर्ण सफाई के लिएनागरिक समाज का बनना-विकसित होना और कुराज के खिलाफ आक्रोस - यही रास्ते बचे हैं झारखंड गढ़ने केयेक

स्थापित और प्रामाणिक तथ्य है कि ईमानदार नौकरशाही बड़ा काम कर सकती है। में ऐसे लोग भी होंगे। उनके पक्ष में माहौल बनाना बड़ी चुनौती है। नया गढ़ने के लिए इँस्टिट्यूशंस की बुनियाद ज़रूरी है। किसी भी समाज का चाल. चरित्र और चेहरा इँस्टिट्यूशंस ही बदल सकते हैं। इँस्टिट्यूशंस शिक्षा में, प्रशासन में राजनीति में यानी उन सभी क्षेत्रों में जहां मानव संसाधन को गढ़ा और बनाया जाता है। जाति, धर्म और समुदाय और क्षेत्र से परे उदार राजनीति को प्रश्रय देना ज़रूरी है।


आज हर दल में, शासन में मीडिया में अच्छे लोग हैं, पर वे पीछे हैं। ऐसे लोग की एकजुटता और सक्रियता क़ानून का राज स्थापित करने में मददगार होगी। यही हीरावल दस्ता समाज और राजनीति को अनुकतरणीय और नैतिक बनाने की बुनियाद रख सकता है।
मंजीत ठाकुर

विचार माफिया



वे बहुत गंभीर हैं
संवेदनशील हैं
उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है
वे सोचते हैं, विचारते हैं
मुद्दे उछालते हैं
वैचारिक आधार पर
लोगों को तौलते हैं, तोड़ते हैं, जोड़ते हैंउनके पीछे लोग हैं
क्योंकि वे मौलिक हैं
(मेरा नहीं, यह उनका दावा है
गोया बौद्धिक संपदा क़ानून के वे देसी
संस्करण यानी डंकल के वंशज हैं)
बुद्धिजीवी मंडी में उनकी साख है
वे बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ते हैं
डिनर चरते हैं
कालाहांडी पर बहस करते हैं
कभी-कभी वे इराक, क्यूबा, सोमालिया बोलते हैं
वे सिद्धांत बोते हैं
और तर्कों के हंसिए से
आंदोलन की फसल काटते हैं


सावधान!
वे विचार माफिया हैं।


(संदीप झा की मार्फत सुशांत झा की यह कविता हमें मिली है। सुशांत राजनीतिक समझ वाले पत्रकार हैं और फिलवक्त आईटीवी में बतौर कॉपी एडिटर काम कर रहे हैं)


मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

कबूतरबाजो, गुर्दागर्दो का नया हब है भारत!

भारत में आजकल रोज विकास के नए-नए मापदंड बन रहे हैं। हमारा प्यारा देश भारत पहले सोने की चिडिया था--ऐसा ही मैंने बचपन में किताबों में पढा था। लेकिन अब जबसे अखबार पढने की आदत लगी है कुछ शब्द लगभग रोज कई-कई बार(और बड़े-बड़े शब्दों में भी--जिनपर आँखे टिकाना मजबूरी बन जाए) पढने पड़ते हैं। इनमें कबूतरबाजी और आजकल 'गुर्दागर्दी' शब्द खूब छाये हुए हैं। इसके साथ ही व्यापारियों की दो नई कॉम भी सामने आई है-- कबूतरबाज़ और गुर्दागर्द।

ये दोनों व्यापार इतना मालामाल लगने लगें हैं की कई लड़के तोअब इस कारोबार को अपनाने पर गंभीरता से सोचने लगे हैं। हों भी क्यों ना जो लोग भी इस कारोबार से जुड़े पकड़े जाते हैं टीवी चैनलों पर कई दिनों तक छाये रहते हैं। इतना ही नहीं फरारी के दौर में जब ये पकड़े जाते हैं तो करोडो रूपये के साथ। अब अपने किडनी कुमार जी को देख लीजिये जब ये नेपाल में पकड़े गए तो इनके पास से लगभग डेढ़ करोड़(?) रुपया का देशी-विदेशी नोट पकडा गया।

उनके बारे में कई दिनों तक अखबारों और टीवी चैनलवों पर ख़बर चलता रहा की इस देश में इनकी इतने करोड़ की sampati है तो falanaa देश में इनके इतने बैंक बैलेंस हैं। इतना ही नहीं अब कबूतरबाजी के धंधे में ही फायदा देखिये कितना ज्यादा है की बड़े-बड़े लोग इस काम में शामिल होने लगे हैं। भी जब इतना फायदा है तो नई पीढ़ी के लोग इस धंधे की ओर आयेंगे ही।

आने वाले २० सालों के बाद जब हमारे देश के इतिहासकार देश का इतिहास लिखने के लिए अखबारों के कतरन से कुछ उठाएंगे तो भारत के आर्थिक विकास के आयामों में इन हस्तियों का नाम बड़े गर्व से लिखेंगे। इतना ही नहीं उस दौर की कवितायें भी कुछ इस तरह की होंगी--- मेरे देश की धरती कबूतरबाज़ उगले, उगले गुर्दागर्द॥ मेरे देश की धरती........फ़िर ये गाने उस वक्त के सभी राष्ट्रिय त्योहारों मसलन वैलेंटाइन डे, माता दिवस, पिटा दिवस, पत्नी दिवस जैसे महान अवसरों पर गाए जायेंगे।..................

(संदीप सिंह दूरदर्शन न्यूज़ से जुड़े हैं)

सोमवार, 25 फ़रवरी 2008

तमिल सिनेमा बदलाव की धारा

कादल के बाद कल्लूरी इस साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म साबित हुई है। कादल की कामयाबी के बाद बालाजी शक्तिवेल बड़ी स्टारकास्ट के साथ महत्वाकांक्षी फिल्म की परियोजना पर काम कर सकते थे, लेकिन बनिस्पत इसके उन्होंने छोटे पैमाने पर फिल्में बनाना जारी रखा है, बल्कि इस बार उनका जुड़ाव और भी गहरा है। लेकिन क्या है ये..

फिल्म कल्लूरी में आपको कुछ अप्रत्याशित लग सकता है। यह फिल्म कॉलेज के नौ लड़कों के तीन साल की जिंदगी पर आधारित है। फिल्म में चरित्रों, प्लॉट और संवाद को अचूक तरीके से पिरोया गया है। ये चरित्र छोटे शहरों के होने पर भी हीनभावना से ग्रस्त नहीं है और अपने खांटी गंवईपन को संवेदनाओं के साथ उघाड़ते हैं।

फिल्म के सारे चरित्र बिलाशक दक्षिण भारतीय दिखते हैं। जाहिर है, उन्हें दिखना भी चाहिए। भोजपुरी फिल्मों की तरह नहीं, जिसमें रेगिस्तानी इलाके के लोग भोजपुरी बोलते नजर आते हैं। फ्रेम में दिख रहा हर चेहरा असली दिखता है। पात्रों के चेहरे पर जबरन मेकअप पोतकर सिनेमाई दिखाने की कोई कोशिश नहीं है। शक्तिवेल ने व्यावसायिक और कला सिनेमा के बीच एक जबरदस्त संतुलन साधा है।

कल्लूरी पिछली कई तमिल फिल्मों मेंसे महज एक उदाहरण भर है, जो समकालीन तमिल सिनेमा में आ रहे शांत लेकिन रेखांकित किए जाने लायक बदलाव की कहानी बयां कर रहा है। यह धारा एक नए बौद्धिक यथार्थवादी और मजबूत पटकथा वाली किस्सागोई वाली फिल्मों की है। राम की कट्टराधु तमिल और अमीर की परुचिवीरन फिल्मों की इस नई धारा की अगुआई कर रही हैं।

क्या सवाल महज इन फिल्मों की कला, उम्दा निर्देशन या उत्कृष्ट कहानी ही है..। जी नहीं, इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तगड़ी कमाई भी की है। कल्लूरी जैसी फिल्में अपने कम बजट और यथार्थवाद के बावजूद बड़े सितारे वाले फिल्मों की बनिस्पत ज़्यादा मनोरंजक साबित हो रही हैं। दरअसल, तमिल सिनेमा की इस नई धारा ने व्यावसायिक सिनेमा की ऊर्जा और मनोरंजन को कला सिनेमा की जटिलता और संवेदना में खूबसूरती से पिरों दिया है।

इस धारा की झलक तो मणिरत्नम् की नायकन और आयिता इझूथु में ही मिल गई थी, लेकिन ऩई पीढी के फिल्मकारों तक यह संदेश पहुंचने में एक दशक से ज़्यादा का वक्त लग गया। तमिल फिल्मों की इस नई धारा में थंकर बच्चन की की पल्लिकूडम, और ओनबाई रूबई नोट्टू, वेगीमारन् की पोल्लाधवन, निशिकांत कामत की ईवानो ओरूवान, पद्मा मगन की अम्मूवागिया नान, गण राजशेखरन की पेरियार, वसंत बालन की वील, सेल्वाराघवन की पुदुपेट्टाई और चेरन थावामई थावामिरुंथु जैसी फिल्में शामिल हैं।

इन फिल्मों के साथ ही तमिल सिनेमा के एक नए दर्शक वर्ग, युवा दर्शकों का उदय हुआ है। जो नई चीज़ देखना पसंद कर रहा है। पिछली दिवाली पर धड़ाके के साथ रिलीज़ हुई आझागिया तमिल मागन, वोल और माचाकाईन दर्शकों के इस वर्ग को मनोरंजक नहीं लगता। दरअसल, दर्शकों के इस वर्ग को नई धारा के खोजपूर्ण सिनेमा का चस्का लग गया है। तमिल फिल्मों की इस नई धारा की एक और खासियत है- शैली। हर निर्देशक का अंदाजे बयां ज़ुदा है। इनमें गाने सीमित है, आम तौर पर ये गाने भी पृष्ठभूमि में होते हैं। छोटी अवधि की इन फिल्मों में कॉमिडी के लिए भी अलग से समांतर कथा नहीं चल रही होती, बल्कि हास्य को कथानक के भीतर से ही सहज स्थितियों से पैदा किया जा रहा है।

ज़्यादातर फिल्मों के विषय बारीकी से परखे हुए होते हैं- गंवई कहानियों का बारीक ऑब्जरबेशन। तमिल सिनेमा की इस नई बयार के ज्यादातर चरित्रों की जड़े परिवार, संस्कृतियों और परंपरा में गहरे धंसी हैं। लेकिन प्रेम या निजी महत्वाकांॿाओं के लिए ये चरित्र हर तरह की बाधाओं पर पार पाते हैं।वैसे, तमिल सिनेमा जिस दौर से गुजर रहा है, वह प्रक्रिया हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की फिल्मो में कमोबेश पूरी हो चुकी है।

हिंदी में ऐसे प्रयोग हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी., मिक्स्ड डबल्स, भेजा फ्राई, पेज-3, रंग दे बसंती, दस कहानियां, खोया-खोया चांद, इकबाल जैसी फिल्मों से किए जा चुके हैं। हालांकि, हिंदी में इन फिल्मों की कहानी शहरी जिंदगी पर आधारित है। मामला चाहे सेक्स का हो, वयस्कता का हो, रिश्तों, काम के बोझ या अपराध की। मिडिल सिनेमा में गांव अबतक अछूते हैं।

तमिल में यह मामला सिर्फ गांव की कहानियों पर आधारित है। जाहिर है दोनो सिनेमा को क्रास ओवर की ज़रूरत है।

‌मंजीत ‌ठाकुर

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

गढवाली मिठाई सिंगोरी


(दीपांशु गोयल हमारे साथी पत्रकार हैं, लेकिन इन्हें जितनी पत्रकारिता पसंद है उतना ही पसंद है घूमना। इनका घुमक्कडपन सधुक्कड़ी की हद तक है। हाल ही में ये श्रीनगर गए थे। ये कश्मीर वाला नहीं गढ़वाल वाला श्रीनगर है। वहां की खास मिठाई खाकर आए हैं, उसका वर्णन इस तरह करते हैं कि हमारे मुंह में पानी आ जाता ..आप भी देखिए क्या है ये मिठाई.. संपादक मंडल)
नई जगहों पर घूमने फिरने का ही एक हिस्सा है हर जगह के खाने पीने का मजा उठाना। मैं जिस जगह भी जाता हूं वहां के अलग तरह के खाने को जरुर खाता हूं। मेरी श्रीनगर यात्रा में मैंने खाई गढवाली मिठाई सिंगोरी।
ये एक तरह का पेडा होता है जिसे मावे से बनाया जाता है। फोटो में आप जो पान जैसी मिठाई देख रहे हैं वही है सिंगोरी। दरअसल इस मिठाई की खासियत ये है कि इसे सिंगोरी के पत्ते में लपेटकर रखा जाता है। सिंगोरी गढवाल में मिलने वाला पेड़ है।
इस मिठाई को बनाने के लिए पेडे को नौ से दस घंटे तक पत्ते में लपेट कर रखा जाता है।जिसके बाद पत्ते की खुशबु पेडे में आ जाती है। यही खुशबु इस मिठाई की पहचान है।

छह के चक्कर में क्रिकेट


इस हफ्ते क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए आईपीएल की बोली लगी, भारत जैसे क्रिकेट के जुनूनी देश में 20-20 क्रिकेट की ऐसी ज़ोरदार शुरुआत कोई अप्रत्याशित भी नहीं थी, लेकिन मसला ये है कि क्या क्रिकेट का मैदान ग्लैमर की चकाचौंध से कितना प्रभावित हो गया है..क्या भलेमानसों का खेल क्रिकेट अब महज एक खेल रह गया है या इसके पीछे भी पहले से सक्रिय बाज़ार की ताकतें और अधिक मजबूती से हावी हो गई हैं। जैंटलमैन गेम का अधिग्रहण शोमैन ने कर लिया है।


क्रिकेट और सिनेमा दोनों से ग्लैमर जुड़ा है। सिक्स पैक एब्स के लिए मशहूर शाह रूख से सिक्सर किंग युवराज या फिर छह करो़ड़ में नीलाम हुए माही, कम लोकप्रिय नहीं हैं। पहले भी कभी-कभार सिने-सितारे मैदान में दिख जाते थे और क्रिकेटिया सितारे भी फिल्मो में नमूदार हो जाते थे। गावस्कर, कपिल पाजी और संदीप पाटिल ने भी कम-ज्यादा फिल्मों में अपनी झलक दिखलाई। लेकिन सिनेमावालों को भी समझ में आ गया कि 35 एम एम की फिल्मों से कम रोमांच 22 गज की क्रिकेट की पिच में नहीं है।


शायद यही वजह रही कि फिल्म ओम शांति ओंम की रिलीज से पहले शाह रूख खुद दीपिका को लेकर क्रिकेट मैच के दौरान स्टेडियम में मौजूद थे। क्रिकेट और सिनेमा का गठबंधन और गाढा हुआ जब फिल्म की पब्लिसिटी के लिए दीपिका पादुकोण के अफेयर पहले कप्तान बने महंद्र सिंह धोनी फिर कप्तानी से चूक गए युवराज के साथ जोड़ा गया।


क्रिकेट विश्व कप के दौरान भी कई फिल्मों में इस भुनाने की बेतरह कोशिशें की गई। हैट ट्रिक हो या स्टंप्ड... क्रिकेट को परदे पर उकेरना वाल philonmon की फेहरिस्त लंबी होती गई। फिर सिनेमा के बिज़नेस से जुड़े लोगों ने यह भी महसूस किया कि क्रिकेट प्रेमियों की नज़र में बने रहने के लिए क्रिकेट का भी सरपरस्त बना रहना ज़रूरी होगा। शायद इसी वजह से शाहरूख ने कोलकाता और प्रीति जिंटा और नेस वाडिया ने मोहाली की टीम को अपनी सरपरस्ती दी।दरअसल, 20-20 ने क्रिकेट भूगोल बदल दिया है। आईपीएल के साथ ही क्रिकेट में चल रही कई जंगों में एक और आयाम जुड़ गया है। खिलाड़ियों की बोली और उनका कीमत का मूल्यांकन खेल से नहीं, बल्कि कुछ और तय कर रहा है, और ये नया आयाम है खबरों में बने रहने की खिलाड़ियों की कूव्वत,उनसे जुड़े विवाद, रंगनी मिजाज़ी, ऊर्जा और उनकी आक्रामक देहभाषा।


शायद यही वजह है कि कथित नस्लवादी टिप्पणियों पर पैदा हुए विवाद की वजह से चर्चित हुए सायमंड्स माही के बाद सबसे ज़्यादा रकम पाने वाले खिला़ड़ी हो जाते हैं, और उनके साथ ही हरबजन भी करीब साढ़े तीन करोड़ की रकम के हकदार हो जाते हैं। वहीं अब भी भलेमानुस दीखने वाले क्रिकेटर कुंबले दीपिका को रिझाने वाले धोनी से एक तिहाई रकम ही पा सके। हम इसे विजिविलिटी कह दें या व्यक्तिगत शौमैनशिप .. एक बात तो साफ है क्रिकेट के इस ताजा़ फटाफट संस्करण की नज़र खेल पर कम ग्लैमर पर ज्यादा है।


ज़ाहिर है अब क्रिकेट में आइकॉन बैकफुट पर चले जा रहे हैं। आक्रामक युवाओं का दौर आ रहा है, ऐसे युवाओं का जिनके पास प्रतिद्वंद्वी को घूरकर देखने की देहभाषा है।